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20th June 2026

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Praveen Nishee Fri, Aug 1, 2025

जगदीप धनखड़ के उप राष्ट्रपति पद से अचानक इस्तीफा देने से देश की राजनीति में भूचाल- सा आ गया है,कोई सोच भी नहीं सकता था कि ऐसा कदम उठा सकते हैं उनके इस्तीफे को लेकर तमाम तरह की अटकलबाजी चल रही है, इस्तीफा देने का कारण खराब स्वास्थ्य बताया है, लेकिन सच्चाई यह है कि इस पर कोई भरोसा नहीं कर रहा है। उपराष्ट्रपति का पद विवादों से आमतौर पर परे रहा है, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि पद पर आसीन शख्सियतें विवादों से हमेशा दूर ही रहीं,कई बार विवाद हुए हैं.उपराष्ट्रपति को लेकर पहला बड़ा विवाद वीवी गिरि से जुड़ा है।1969 में राष्ट्रपति डॉ जाकिर हुसैन के निधन के बाद तब उप राष्ट्रपति गिरि कार्यवाहक राष्ट्रपति बने,तब कांग्रेस के भीतर पीएम इंदिरा गांधी- पुराने नेताओं के ‘सिंडिकेट’ के बीच सत्ता संघर्ष चरम पर था,कांग्रेस उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी थे,जिन्हें सिंडिकेट का समर्थन प्राप्त था, इंदिरा ने वीवी गिरि को स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने प्रोत्साहित किया उन्होंने कांग्रेस के सांसदों और विधायकों से ‘अंतरात्मा की आवाज’ पर वोट देने का आह्वान किया, परिणाम यह हुआ कि गिरि बहुत ही करीबी मुकाबले में जीत गये।उस घटना ने कांग्रेस को दो फाड़ कर इंदिरा गांधी को सर्वोच्च नेता के रूप में स्थापित किया, वह ऐसा मामला था,जहां उपराष्ट्रपति का पद सीधे तौर पर सत्ता संघर्ष का एक उपकरण बन गया,1977 में राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली के निधन पर उपराष्ट्रपति बीडी जत्ती कार्यवाहक राष्ट्रपति बने।आपातकाल के बाद केंद्र में जनता पार्टी की सरकार बनी, 9 कांग्रेस शासित राज्यों की विधान सभाओं को भंग करने की सिफारिश की,कार्यवाहक राष्ट्रपति जत्ती ने अध्यादेश पर हस्ताक्षर करने में हिचकिचाहट दिखाई, तब संवैधानिक संकट पैदा हो गया था, क्योंकि यह सवाल उठा क्या कार्यवाहक राष्ट्रपति कैबिनेट की सलाह मानने के लिए बाध्य हैं,कुछ दिनों बाद उन्होंने हस्ताक्षर कर दिये, इस घटना ने कार्यवाहक राष्ट्रपति की शक्तियों पर बड़ी बहस छेड़ दी थी, दो बार के उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी का कार्यकाल काफी हद तक गैर- विवादास्पद रहा लेकिन कार्यकाल के अंत में दिये गये बयानों ने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया, कार्यकाल के अंतिम दिन साक्षात्कार में कहा देश के मुसलमानों में ‘असुरक्षा और बेचैनी की भावना’ है,उनके उस बयान की सत्ताधारी दल,समर्थकों ने तीखी आलोचना की। उससे पहले गणतंत्र दिवस परेड के दौरान राष्ट्रगान के समय ध्वज को सलामी न देने पर उनकी आलोचना हुई थी, बाद में स्पष्ट किया गया कि प्रोटोकॉल के अनु सार केवल राष्ट्रपति ही सलामी देते हैं अन्य सभी गणमान्य सावधान की मुद्रा में खड़े होते हैं। हामिद अंसारी उपराष्ट्रपति आवास में रहे, तब तक वहां अनेक लेखकों की किताबों के विमोचन होते रहे,उन्हें लेखकों-विद्वानों से मिलना पसंद था,खुद कई किताबें लिखी थीं…उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने 2018 में राज्यसभा के सभापति के रूप में तब के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ विपक्ष द्वारा लाये गये महाभियोग प्रस्ताव को खारिज कर दिया था,तब विपक्ष ने आरोप लगाया था कि नायडू ने निर्णय जल्द बाजी में,सरकार के दबाव में लिया,नायडू ने अपने फैसले को यह कहते हुए सही ठहराया कि प्रस्ताव में लगाये गये आरोप ‘अस्पष्ट’ थे ‘सिद्ध कदाचार’ की श्रेणी में नहीं आते थे।उस फैसले ने न्यायपालिका, कार्य पालिका और विधायिका के बीच संबंधों पर एक तीखी बहस को जन्म दिया और सभापति की विवेकाधीन शक्तियों को चर्चा के केंद्र में ला दिया था।नायडू,आवास में भी लेखकों, नौजवानों, कलाकारों से मिला करते थे।अगर इन कुछ उदाहरणों को छोड़ दें, तो उपराष्ट्रपति के रूप में डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन,डॉ जाकिर हुसैन,गोपाल स्वरूप पाठक वेंकट रमण, शंकरदयाल शर्मा, डॉ केआर नारायणन, कृष्णकांत, भैरोसिंह शेखा वत के कार्यकाल शांति से निकले,देश के उपराष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन की बात करें, तो उनकी पहल पर ही राजधानी को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर मिला था, उन्होंने पीएम जवाहरलाल नेहरू से इच्छा जतायी थी कि राजधानी में कोई जगह बन जाये, जहां पढ़ने- लिखने की दुनिया से जुड़े लोग मिल-बैठ सकें।उनकी सलाह नेहरूजी को पसंद आयी,उन्होंने शहरी विकास मंत्रालय को निर्देश दिये कि वह एक प्लॉट अलॉट करे, कृष्णकांत का उपराष्ट्रपति पद पर रहते 27 जुलाई, 2002 को निधन हो गया था, उसके बाद भैरोंसिंह शेखावत उपराष्ट्रपति बने, कार्यकाल 19 अगस्त, 20 02 से 21 जुलाई, 2007 तक रहा, उस दौर में भी उपराष्ट्रपति आवास के गेट आम- खास सब के लिए खुले रहते थे,उनसे मिलने वालों की भीड़ कभी कम नहीं होती थी,खैर जगदीप धनखड़ के अप्रत्याशित इस्तीफे का असर अभी कुछ दिनों तक और चलने वाला है।

सीएम, राज्यपाल,डिप्टी सीएम,

वित्त मंत्री और चर्चा......

छग को पहली बार एक आदिवासी (अजीत जोगी की जाति तो चर्चा में रही) के रूप में विष्णु देव साय को सीएम बनाया गया है, काम से काम रखने वाले सीधे सादे साय, तौल-तौल कर बोलते हैं....वहीं उनके 2 डिप्टी सीएम अरुण साव विजय शर्मा जरूर 'बयान वीर' हैं..हर मुद्दे पर बोलने में पीछे नहीं रहते हैं, वहीं पूर्व नौकरशाह, वित्तमंत्री ओपी चौधरी भी बयान देने में पीछे नहीं हैं,उन्हें रायगढ़ की जनता वन कटाई, कभी रायगढ़ में मैरिन ड्राइव बनाने, लोगों का घर उजाड़ने निशाने पर लेती है... तो अब वे अपनी ही पार्टी की यूथ विंग के अध्यक्ष, एक आदिवासी नेता रवि भगत के निशाने पर है,युवा नेता की मांग है,डीएमएफ मद का खर्च केवल रायगढ़ में करने के साथ ही लैलूंगा के विकास में भी खर्च करें! उसे पार्टी से निष्कासित करने की तैयारी है....अब बात कर लें छ्ग के राज्य पाल की....... छत्तीसगढ़ में भाजपा के पूर्व सांसद रमन डेका को राज्यपाल बनाकर भेजा गया है।वे गांव, तहसील, ब्लाक, जिला स्तर पर 'एक पेड़ माँ के नाम' लगाने में व्यस्त हैं... साथ ही जहाँ भी जाते हैं वहाँ पटवारी से कलेक्टर तक की बैठक लेकर निर्देश देते हैं, अब तो राजभवन में भी अफसरों की बैठक ले रहें हैं.... खैर वे प्रदेश के संवैधानिक प्रमुख हैं, राज्य की टोह ले रहे हैं पर उनकी बैठकों से राज्य सरकार असहज महसूस कर रही है और दिल्ली तक 'बैठक' की खबर पहुंचाई गई है ऐसी चर्चा है...?

छत्तीसगढ़ में बढ़ेगी

मंत्रियों की संख्या....

छत्तीसगढ़ में मंत्रिमंडल का विस्तार होगा या अभी नहीं होगा... यह तो कहा नहीं जा सकता पर यह तय है कि छ्ग बनने के बाद पहली बार मंत्री के पद बढ़ने जा रहे हैं।सरकार यहां पर हरियाणा फॉर्मूला लागू करने की तैयारी में है, कहा जा रहा है इसके लिए सरकार ने हरियाणा नीति पर मंथन कर हरी झंडी दे दी है, विधानसभा में कुल सीटों में 15% के आधार पर मंत्रिमंडल विस्तार किया जाता है। छग में विधान सभा की कुल 90 सीटें हैं।15% के हिसाब से 13.5 का आंकड़ा होता है, इसके आधार पर अभी तक 13 मंत्री ही रहे हैं,लेकिन इस बार13.5 के आंकड़े को पूरा बना 14 मंत्री बनाये जाएँगे। हरियाणा में भी विधानसभा की 90 हैं और वहां 14 मंत्री बनाए गए हैं।आज के हालात में सरगुजा संभाग से सीएम और 3 मंत्री आते हैं, ऐसे में मंत्रि मंडल विस्तार में बिलासपुर बस्तर,रायपुर, दुर्ग संभाग को प्राथमिकता मिल सकती है।जाति के समीकरण की बात करें तो एक सामान्य, बनिया,ओबीसी और आदि वासी वर्ग से आने वाले विधायक को जगह मिल सकती है। मंत्रिमंडल के विस्तार में नए चेहरों को भी शामिल करने की चर्चा है।

और अब बस.......

0 कुछेक मंत्रियों के निजी सचिव, ओएसडी की अधिकारियों पर "दबाव" बनाने की चर्चा तेज है...?

0छ्ग की वित्तीय हालत क्या ठीक-ठाक नहीं है?

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