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: ब्रिटिशकाल में बनी भनवारटंक रेल सुरंग 117 साल पुरानी और कई चर्चाएँ भी

Admin Mon, Sep 9, 2024

छत्तीसगढ़ के पेंड्रा की एक रेल सुरंग अनोखी है,ब्रिटिश काल में बनाई गई ये सुरंग 117साल पुरानी है।भनवा रटंक रेल सुरंग का निर्माण 1907 में अंग्रेजों ने कटनी से बिलासपुर को जोड़ने कराया था। पहाड़ काटकर 331 मीटर लंबी सुरंगबनाई गई थी।यहां से गुजरनेवाली ट्रेनों के पीछे स्थानीय लोग अलग-अलग घटनाओं का जिक्र करतेहैं। यह प्रदेश की सबसे ऊंची जगह पर स्थित है,यहां से गुजरने वाली ट्रेनों की रफ्तार टनल के पास आते ही 10 किमी/घंटे की हो जाती है। हैरान करने वाला तथ्य ये है कि उसी के साथ लगे दूसरे टनल से ट्रेन 45 किमी/घंटे की रफ्तार से चलती है,इस टनल में आकर ट्रेन की रफ्तार धीमी हो जाती है?पेंड्रा से बिलास पुर जाने के दौरान खोडरी व भनवारटंक के बीच यह रेल-टनल बनी हुई है।रेल टनल का निर्माण 1907 में अंग्रेजों ने कटनी से बिलासपुर को जोड़ने के किया था, 331मीटर लंबी इस टनल का निर्माण छत्तीसगढ़ के सबसे ऊंचे पहाड़ में सुरंग बनाकर किया था, जिसका इस्तेमाल आज 117 वर्षों बाद भी किया जा रहा है। इस टनल से जब भी कोई ट्रेन गुजरती है तो उसकी रफ्तार 10 किमी/घंटे हो जाती है।भनवारटंक के दूसरी तरफ बनी सुरंग का निर्माण1966 में अपलाइन के लिए किया था। इसकी उम्र पुरानी सुरंग से लगभग 59 साल कम है, लंबाई भी 109 मीटरअधिक लगभग 441 मीटर है।इतनी लंबी रेललाइन होने के बाद भी भनवारटंक टनल के पास वाली सुरंग से ट्रेनें 45 कि मी/घंटे की रफ्तार से निकलती हैं, वहीं पुरानी टनल से ट्रेनों की रफ्तार कम हो जाती है। पुरानी टनल बेहद जर्जर अवस्था में है। इसके अंदर की बनावट अंग्रेजों की इंजीनियरिंग के आधार पर की गई है। टनल के अंदर थोड़ी-थोड़ी दूरी पर छोटे- छोटे सुरंगनुमा कमरे हैं, जिन्हें देखकर लगता है कि मानो ट्रेन आने के दौरान कर्मचारी इन्हीँ कमरों में घुस जाते होंगे...! टनल के बीचों बीच पानी का एक स्रोत है, जिसमें से शुद्ध व ठंडा पानी निकलता है।यह पहाड़ोँ से रिसकर यहीं जमा होता है।भनवारटंक टनल में घुसने से पहले ट्रेनों की रफ्तार धीमी होने के पीछे स्थानीय लोग कई तरह के किस्से बताते हैं।इसमें मुख्य रूप से एक हादसा भी है।साल 1981 में इस टनल से निकलते आमानाला के 100 फुट ऊंचे ब्रिज पर नर्मदा एक्सप्रेस को पीछे से आती मालगाड़ी ने टक्कर मार दी थी।इस हादसे में 50 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी।जानकारों की मानें तो दुर्घटना वाली जगह पर खाई और सुनसान होने के कारण शवों को वहां से 2 किमी दूर भनवारटंक के नजदीक एक नीम के पेड़ के नीचे रखा गया,जहां से बाद में लोगों ने शवों की पहचान कर ले गये थे।कहा जाता है कि इस हादसे के बाद वहां के स्टेशन मास्टर को लगातार सपना आने लगा, जिसमें उसे नीम के पेड़ के नीचे कोई बुलाता और पूजा-अर्चना कराने की बात कहता था इसके बाद वहां पहले से स्थित मरहीमाई के मंदिर में पूजा अर्चना होने लगी। तभी से सुरंग के पास ट्रेन की रफ्तार धीमी कर दी जाती है।हर ट्रेन का ड्राइवर रफ्तार धीमी कर उस जगह का सम्मान करते हुए निकलता है,वहीं कुछ का मानना है कि यह 117 साल पुरानी टनल अंदर से 45 डिग्री तक मुड़ी हुई है, इस वजह से वहां ट्रेन तेजी से नहीं निकाली जा सकती है,कुछ का यह भी कहना है कि टनल पुरानी होने से ट्रेन को यहां धीमा किया जाता है। बहरहाल पहाड़ों में छुपी इन रहस्यों की सच्चाई क्या है इन दावों की पुष्टि तो नहीं की जा सकती, लेकिन ट्रेन की रफ्तार, मान्यताओं की कहानी दिलचस्प है....?

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